तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं की गरिमा पर असर डालता है, केन्द्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा

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नई दिल्ली. केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि यदि तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं की डिग्निटी (गरिमा) और सोशल स्टेट्स (सामाजिक स्तर) पर प्रभाव डालता है तो इससे उनके कॉन्स्टीट्यूशन में मिले फण्डामेंटल राइट्स की अनदेखी होती है, यह रस्में मुस्लिम महिलाओं को उनकी कम्युनिटी के पुरूषों और दूसरी कम्युनिटी की महिलाओं के मुकाबले में कमजोर बना देती है, केन्द्र सरकार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में दी गयी अपनी लिखित दलीलों में यह बातें कही हैं, सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे  पर 11 मई को सुनवाई करेगा। 
सरकार ने कोर्ट में कहा कि भारत की आबादी में मुस्लिम महिलाओं की हिस्सेदारी 8ः है।। देश की ये आबादी सोशली और इकोनॉमिकली बेहद अनसेफ है। सरकार ने साफ किया कि महिलाओं की डिग्निटी से कोई कम्प्रोमाइज नहीं हो सकती। केंद्र ने अपनी दलीलों में आगे कहाए लैंगिक असमानता का बाकी समुदाय पर दूरगामी असर होता है। यह बराबर की साझेदारी को रोकती है और आधुनिक संविधान में दिए गए हक से भी रोकती है।  सरकार ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में 60 साल से ज्यादा वक्त से सुधार नहीं हुए हैं और मुस्लिम महिलाएं फौरन तलाक के डर से बेहद कमजोर बनी रहीं। केंद्र ने कहाए  यह कहना सच हो सकता है कि तीन तलाक और एक से ज्यादा शादियों का असर कुछ ही महिलाओं पर होता हैए लेकिन एक हकीकत यह भी है कि इसके दायरे में आने वाली हर महिला उसके खिलाफ इसके इस्तेमाल के डर और खतरे में जीती है।  इसका असर उनके हालातए उसकी पसंदए उनके आचरण और उनके सम्मान के साथ जीने के उनके हकों पर पड़ता है 
आपको बता दें कि केन्द्र सरकार ने तीन तलाक, निकाह हलाला और कई शादियों जैसी प्रथाओं का विरोध किया था, केन्द्र सरकार ने कोर्ट से अपील की थी कि उसे जेंडर इक्विलिटी और सेक्युलिरिज्म के तौर पर इन मामलों को देखना चाहिये। लॉ और जस्टिस मिनिस्ट्री ने संविधान के आधार पर जेंडर इक्विलिटी सेक्युलरिज्म, निकाह कानून और दूसरे इस्लामिक देशों में इस मामले पर अनाये जा रहे तौर तरीकों की दलीलें कोर्ट में पेश की थी। तीन तलाक को लेकर कोर्ट में कई पिटीशंस फाइल की गयी थी इनमें से एक सायरा बानो नाम की महिला ने दायर की थी, इसमें उन्होंने तीन तलाक और ऐसे ही मुद्दों पर कोर्ट से दखल देने की मांग की थी। उनकी पिटीशन में कहा गया था कि संविधान ने जेंडर इक्विलिटीकी इजाजत दी है।  
आपको बता दें कि पिछले दिनो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ;एमआरएमद्ध ने तीन तलाक के खिलाफ एक अभियान चलाया था। इसमें तलाक को लेकर एक पिटीशन साइन कराई गई थी।  दावा है कि इस पिटीशन पर करीब 10 लाख मुस्लिमों ने दस्तखत किए। इनमें ज्यादातर महिलाएं थीं।  एमआरएम की ओर से जो पिटीशन साइन करवाई गईए उसमें कहा गया कि इसको धर्म से जोड़कर ना देखा जाएए क्योंकि यह एक सोशल प्रॉब्लम है। आपको बता दें कि कई महिलाएं सुप्रीम कोर्ट में भी पिटीशन लगाकर तीन तलाक को खत्म करने की मांग कर चुकी हैं।
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